अचिंत्य ऐश्वर्य संपन्न प्रभु! पृथ्वी,स्वर्ग, पाताल तथा दिशा -विदिशाओं में, आप के प्रभाव से युक्त, जो जो भी विभूतियां है,आप कृपा करके मुझसे उनका वर्णन कीजिए। प्रभु! मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूं,जो समस्त तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले हैं।5 उद्धव जी! मैं समस्त प्राणियों का आत्मा,हितेषी,सुह्रद और ईश्वर अर्थात नियामक हूं। मैं ही,इन समस्त प्राणियों और पदार्थों के रूप में और इनकी उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय का कारण भी हूं। 9 उद्धव जी! मैंने तुम्हारे प्रश्न के अनुसार, संक्षेप से, विभूतियों का वर्णन किया।यह सब परमार्थ वस्तु नहीं है, मनोविकार मात्र है; क्योंकि मन से सोची और वाणी से कही हुई कोई भी वस्तु परमार्थ (वास्तविक) नहीं होती, उसकी एक कल्पना ही होती है 41 इसलिए, तुम वाणी को स्वच्छंद भाषण से रोको, मन के संकल्प विकल्प बंद करो; इसके लिए प्राणों को वश में करो और इंद्रियों का दमन करो। सात्विक बुद्धि के द्वारा प्रपंचाभीमुक्त होकर, शांत हो जा;फिर तुम्हें संसार के जन्म-मृत्यु रूप बीहड़ मार्ग में, भटकना नहीं पड़ेगा। 42ŚB 11.16.42 वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च ...